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लघुसिद्धान्तकौमुदयः चतुर्थः पाठः (Fourth Lession Laghu Siddhanta Kaumudi)

२००७-०७-०१ रविवासरः (2007-07-01 Sunday)

ह्यः रात्रौ अस्माकं चतुर्थः पाठः आसीत्। वयम् अधोलिखितानि सूत्राणि अपठम -

५३ चादयोऽसत्त्वे १।४।५७। अद्रव्यार्थाश्चादयो निपाताः स्युः।

५४ प्रादयः १।४।५७। एतेऽपि निपाताः तथा।

५५ निपात एकाजनाङ् १।१।१४। एकोऽज् निपात आङ्वर्जः प्रगृह्यः स्यात्। इ इन्द्रः। उ उमेशः।

५६ ओत् १।१।१५। ओदन्तो निपातः प्रगृह्यः। अहो ईशाः।

५७ संबुधौ शाकल्यस्येतावनार्षे १।१।१६। सम्बुद्धिनिमित्तक ओकारो वा प्रगृह्योऽवैदिके इतौ परे। विष्णो इति, विष्ण इति, विष्णाविति।

५८ मय उञो वो वा ८।३।३३। मयः परस्य उञो वो वा अचि। किम्वुक्तम्, किमु उक्तम्।

५९ इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च ६।१।१२७। पदान्ता इको ह्रस्वा वा स्युः असवर्णेऽचि।

६० अचो रहाभ्यां द्वे ८।४।४६। अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः।

६१ ऋत्यकः ६।१।१२८। ऋति परे पदान्ता अकः प्राग्वद्वा। ब्रह्मा ऋषिः इति ब्रह्म ऋषिः भवति।

इत्यच्सन्धिः॥

 


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